Wednesday, April 3, 2013

लफ्जो की नजर उतारी जाए!
जुल्फ-ए-गजल सवारी जाए!

हाल-ए-कलम है यू आजकल,
न जादू हो , न अय्यारी जाए!

खूबसूरत बन जाए ये दुनिया,
आदमी की जो होशियारी जाए!

हम भी घंटो से खड़े है छत पर, 
जो चाद जाए, तो बेगारी जाए!

जबतक जान है लिखूगा श्याम,
कैसे मन्दिर छोड़ पुजारी जाए!